उत्तराखंडऋषिकेश

श्री आनंदमयी माँ जयंती पर डॉ.भारती कौशिक की कलम से प्रकाशित आलेख

ऋषिकेश।श्री आनंदमयी माँ की विशुद्ध सत्व से निर्मित भागवती देह का प्रादुर्भाव पूर्वी बंगाल के त्रिपुरा जिले के अंतर्गत “खेवडा” नामक ग्राम में 30 अप्रैल सन 1896 को प्रातः 3 बजे हुआ था। भगवान श्री कृष्ण की भांति बाल्यकाल से ही माँ के जीवन में भगवदीय ऐश्वर्य- माधुर्य का प्रस्फुटन आरंभ हो गया था।

आपके साथ सतत एक दिव्य ज्योति विद्यमान रहती थी,जिसने बाद के वर्षों में अपना परिचय “आपकी शक्ति” कह कर दिया था।माँ का आविर्भाव अन्य अवतारों या अधिकारी पुरुषों की भांति किसी ‘मिशन’ को लेकर नहीं हुआ था, अपितु केनोपनिषद के ‘यक्ष’ की भांति परम सत्य ही आपके अलौकिक रूप में उद्घाटित हुआ था।

जिससे कि धरती के प्राणी ‘सत्य’ को सीधा ही देख सकें, जान सकें, पा सकें।माँ का दर्शन एक समग्र दर्शन है, जिसमें मानव समाज के उत्थान और उसे पूर्णता की ओर अग्रसर करने हेतु, माँ ने कई महत्वपूर्ण सूत्र प्रदान किए हैं।माँ ने अपनी स्वानुभूति के आधार पर जिन जीवन-मूल्यों को प्रतिपादित किया है।

उसकी सबसे बड़ी विशेषता ‘समष्टिगत-दृष्टि’ अर्थात संपूर्ण समाज को ध्यान में रखते हुए मानव कल्याण पर आधारित है। माँ कहती हैं – “नैतिक जीवन को आधार बनाकर धर्म जीवन गठित करो,कर्म जगत में उसे अग्रगण्य करो।इस प्रकार महाशक्ति संचित होने से तुम्हारी स्वाधीनता में कौन हाथ दे सकता है ?अपने ऊपर स्वयं शासन नहीं कर सकते तो विराट परतंत्र किस तरह चलाओगे ? “माँ के समाज-दर्शन में सभी वर्ग के व्यक्तियों को स्वभाव से नियत ‘कर्म’ जो उसके ‘स्वधर्म’ है उसका पालन करने की प्रेरणा प्रदान की गई है,तथा बिना किसी भेदभाव के सभी के लिए एक ऐसा संदेश है,जो समाज में व्याप्त दुराचार, अन्याय, अनीति और अशांति आदि विकृतियों के मूल कारण को समाप्त करने तथा समाज की सुव्यवस्था को बनाए रखने एवं सामाजिक जीवन को दिशा प्रदान करने में पूर्णत: सहायक सिद्ध होगा।संपूर्ण शास्त्रों का सार माँ द्वारा प्रतिपादित इन पांच महावाक्यों में निहित है –
(1)”एकं ब्रह्म द्वितीयं नास्ति”
(2) “जहां एक ब्रह्मबोध है,वहां कुछ छूटता नहीं
(3) “अपने को पाना माने भगवान को पाना, भगवान को पाना माने अपने को पाना ”
(4) “सब भगवान है ”
(5) “भगवान हैं- “जो कहो वही”” एक और अनंत…” माँ की दिव्य जीवन सरिता सन् 1932 से 1982 ( 50 वर्षों ) तक पावन गंगा की तरह पूरे भारत में एक छोर से दूसरे छोर तक निरंतर बहती रही,मुक्त हस्त से आध्यात्मिक चेतना का वितरण करते हुए,कोटि-कोटि पिपासुओं की आध्यात्मिक प्यास बुझाते हुए, बंजर भूमि को उर्वर बनाते हुए, सूखे हृदयों को हरा-भरा करते हुए,साकार रूप में प्रकट कर्म-भक्ति ज्ञान की इस अद्भुत त्रिवेणी में कितने ही जिज्ञासु भक्त-जन स्नान कर कृतार्थ हुए इसकी गिनती नहीं है। 27 अगस्त 1982 में यह पावन धारा अपने अव्यक्त स्वरूप-सिंधु में विलीन हो गई।

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